कमीना कॉमरेड और निर्दोष प्रचारक : एक केश स्टडी

■ सांस्कृतिक राष्ट्रवादी संगठन (RSS/ABVP) के ताकतवर प्रचारकों को जब कोई वामपंथी संस्था में या फिर किसी अकादमिक वामपंथी के द्वारा अगर कोई सम्मान (बौद्धिक देने के लिये निमंत्रण) दिया जाता है, तो आरएसएस/ABVP के ऊँचे ओहदे पर बैठे प्रचारकों को ऐसा लगता है कि वामपंथियों को आत्मज्ञान हो गया है।

■ ऐसी स्थिति में उन प्रचारकों को लगता है कि देखो वामपंथी लोगों को आरएसएस के विचारधारा में रुचि हो गयी है। इसलिये उन्होंने हमे बोलने के लिये निमंत्रण दिया है ,इसलिये प्रचारक जी उस कार्यक्रम में लेफ्ट की आलोचना किये बगैर ही लिबरल थॉट्स बघार कर, इस भरोसे आ जाते है कि शायद लेफ्टिस्ट सुधर जाएँ l

■ ऐसे कार्यक्रमों में आरएसएस के प्रचारकों का यह प्रयास भी रहता है कि वो अधिक से अधिक छात्रों को संघ का दर्शन समझायें।

■ लेकिन वास्तविकता क्या होती है ??

■ ऐसे कार्यक्रमों में वामपंथियों के दो लक्ष्य होते हैं।

पहला, आरएसएस के ऊँचे ओहदे पर बैठे प्रचारकों को अपने जाल में फंसाना, जिससे कि वो कुलपति बन सकें या फिर बड़े-बड़े प्रोजेक्ट पा सकें

दूसरा, आरएसएस के प्रचारकों को एक डेटा सेट की तरह इस्तेमाल करना, मतलब यह कि आरएसएस की बेसिक आइडियोलॉजी का रियल टाइम एनालिसिस कर अपने नॉलेज गैप को भरना और उसके आधार पर आर्टिकल लिखना और अन्य वामपंथियों को आरएसएस के बारे में मुखबिरी करना।

उपरोक्त दोनों लक्ष्य बहुत महत्वपूर्ण होते हैं ।

कार्यक्रमों में बतौर मुख्यवक्ता आये प्रचारकों का भ्रम

सबसे पहले कार्यक्रमों में बतौर मुख्यवक्ता आये प्रचारकों को ऐसा लगता है कि वाह क्या तैयारी की है इस वामपंथी संस्थान ने या इस वामपंथी प्रोफेसर ने साथ ही उनको यह लगता है कि उस सेमिनार हाल में सबलोग उनको सुनने बैठे हैं l

वामपंथी लोग ऐसा आवभगत का दिखावा करते हैं कि प्रचारक उसको सीरियस ले लेते हैं । कई दिन सोचते हैं कि बामपंथी अकादमिक जगत ने उनको कितना सम्मान दिया है l इस अकादमिक सम्मान को देख उनको ऐसा लगता है कि काश लेफ्टिस्ट अकादमिक जगत को पहले ही गले लगा लिए होते तो कितना अच्छा रहता l (निर्दोष प्रचारक की आंतरिक प्रतिक्रिया)

कार्यक्रम में उपस्थित कॉमरेड का रिएक्शन

देखिए आरएसएस के प्रचारकों को जब कोई वामपंथी, या लेफ्ट लीनिंग संस्थान बौद्धिक के लिये बुलाता है, तो उसके पहले एक गुप्त मीटिंग करते हैं। जिसमें अपने कॉमरेड ग्रुप को चुप रखने के लिए कन्वेंस किया जाता है। ज्यादा लबर-लबर करने वाले लेफ्टिस्टों से एक विनम्र निवेदन किया जाता है कि वो कार्यक्रमों में चुप रहें, या शालीनता से सवाल पूँछे अन्हीं तो हमारी बनी बनाई मायाजाल का पोल खुल जायेगा l

जो भावुक कॉमरेड होता है वह कार्यक्रम को अटेंड नहीं करता है, और ऐसा मानता है कि जिस विचारधारा को अबतक मेरे कॉमरेड प्रोफेसर राष्ट्रवादी टट्टी कह कर ना चाटने की सलाह देते थे, आज वही कैसे इनके तलवे चाट रहा है l (भावुक कॉमरेड)

हरामी कॉमरेड : (जिसको नियुक्ति लेनी है, या फिर जिसका फलक बड़ा है) या तो वह पूरे कार्यक्रम भर चुपचाप रहते हैं। या फिर एक आज्ञाकारी कुत्ते की तरह दुम हिलाते रहते हैं और या फिर उस दिन भकन्दर का इलाज कराने का बहाना करके डॉक्टर के पास चले जाते हैं।

दूसरी तरफ जो कामरेड सेमिनार हाल में बैठे होते हैं, ऐसे कामरेड पूरे कार्यक्रम के दौरान आपस मे माननीय प्रचारक का मजा लेते हैं। हर बात का मजा लेते हैं, और महीनों मजा लेते हैं।

कार्यक्रम में भीड़ की व्यवस्था : ऐसे कार्यक्रम जिसमें भारी भरकम भाईसाहब आते हैं तो भीड़ इकट्ठा स्वाभाविक रूप से हो जाता है। तमाम स्वेमसेवक, ABVP के कार्यकर्ता इत्यादि वहाँ इकठ्ठा हो जाते हैं।

■ ऐसे बड़े बड़े प्रचारक जो उंगली के एक झटके में ही किसी अभी महा अयोग्य और राष्ट्रद्रोही व्यक्तियों का शुद्धिकरण करने की क्षमता रखते हैं, उनको लगता है कि ये सब भीड़ वामपंथियों की ही है।

■ दर्जनों स्वयं सेवकों में किसी भी एक स्वयंसेवक को नेचुरल तरीके से पहचान ले तो ठीक नहीं तो कार्यक्रम के बाद खुद को पहचवाने वालों की भीड़ तो लग ही जाती है।

ऐसे कृत्यों का परिणाम क्या होता है ?


ऐसे कार्यक्रमों के आयोजन से वामपंथियों की हकीकत जानने वाले प्रचारकों के मन से वामपंथियों के प्रति घृणा का भाव कम होता है। प्रचारकों को लगने लगता है कि वामपंथी शिक्षक और छात्र राष्ट्रवादियों से कहीं आगे हैं। और इसलिए कुलपति इत्यादि या फिर डायरेक्टर इत्यादि बनाने के वक्त प्रचारक राष्ट्रवादी शिक्षकों इत्यादि की अनदेखी कर देते हैं ।जिसका परिणाम देश भर में दिखने को मिल रहा है ।इस कारण राष्ट्रवादी छात्रों और शिक्षकों में घोर निराशा का प्रवाह होता है और वह वैचारिक अरुचि के शिकार हो जाते हैं l

सुझाव: वामपंथी आरएसएस के बड़े प्रचारकों के उपयोगिता को भली भांति समझते हैं । ये लोग या तो आरएसएस को एक डेटा सेट की तरह इस्तेमाल करते हैं या फिर कुलपति, शिक्षक या बड़े प्रोक्ट्स इत्यादि लेने के लिए इनका इस्तेमाल करते हैं । इसलिए भाजपा के इन छह वर्षों के कार्यकाल में आरएसएस को बामपंथी हेजोमोनी से बाहर निकलने का रास्ता तालाश करना चाहिए और अपने स्वयंसेवकों पर भरोसा करना चाहिए l

धन्यवाद

2 Comments

  1. तथ्यात्मक और बहुत्बउपयोगी विश्लेषण। हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ।

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