सरसंघचालक जिन्हें वर्ष में सिर्फ दो बार याद किया जाता है।

संघ के जितने भी सरसंघचालक हैं, उनका नॉलेज ट्रेडिशन और जीवन दर्शन सिर्फ संघ तक ही सिमट कर रह गया है। इस मामले में परमपूजनीय डॉ हेडगेवार जी और आदरणीय गोलवलकर जी थोड़ा खुशनसीब रहे कि उनके चित्र कार्यक्रम स्थलों पर सुशोभित तो होते ही हैं साथ में बौद्धिकों में उनका कुछ जगहों पर रेफरेंस भी ले लिया जाता है।

मैं उपरोक्त दोनों आदरणीयों का अन्य जैसे, सरसंघचालक आदरणीय बालासाहेब देवरस जी, आदरणीय रज्जु भैया जी और आदरणीय सुदर्शन जी से तुलना नहीं कर रहा हूँ ना ही मैं कोई इर्ष्या बाँट रहा हूँ।

यह संघ का एक मान्य सत्य है कि संघ में स्थान और पहचान को लेकर कभी कोई संघर्ष नहीं रहा और ना ही किसी के भी सरसंघचालक बना दिये जाने पर कोई आपत्ति होती है। यह बिना शर्त अत्यंत श्रद्धा से स्वीकार करने का एक प्रचलन है।

मेरा संदर्भ यहां यह है कि आज चतुर्थ सरसंघचालक आदरणीय रज्जु भैया का जन्मदिन है, और कई लोग बिना उनका जीवन दर्शन पढ़े ही या फिर उनके जीवन दर्शन के अनुरूप संघर्ष किये ही बधाई पर बधाई दिए जा रहे हैं।

कहाँ किसी को कोई मतलब है, आज के प्रमुख अखबारों या फिर चिंतकों को ही देख लीजिए , एक भी कायदे का लेख उनपर नहीं लिखे गए हैं। जब सब आत्ममुग्ध ही हैं तो कहां से विचारों के प्रति समर्पण आयेगा।

मुझे तो लगता है कि आदरणीय रज्जु भैया सबसे कम डॉक्यूमेंटेड सरसंघचालक रहे हैं। आरएसएस में डेटा कलेक्शन और केस स्टडी करने का कोई ट्रेडिशन नहीं है और ना ही इसपर कोई बल दिया जाता है।

इस कारण ही तो देश के गद्दार यानी की हाफ बेक्ड लोग जैसे लेफ्टिस्ट इसका फायदा उठाकर उलूल- जलूल लिखते हैं। आज आदरणीय रज्जु भैया पर देश भर में जितने लोग उनको याद किये हैं, वो अपने अपने भीतर के स्वयंसेवक को टटोलें और खास कर ऐसे प्रोफेसर या स्वयंसेवक जो संघ के मातहत हैं, या फिर संघ से अपनी अस्मिता जोड़ते हैं,उन्होंने आदरणीय रज्जु भैया पर आज क्या कंट्रीब्यूट किया है जरा अपने गिरेबान में झांक लें।

आदित्यनाथ

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