उदर से शिशन की शिखर यात्रा

#Decolonizationproject

(१) एक दिन मैं किसी अखबार में पढ़ रहा था कि एनीमल किंगडम में जितने भी जीव जंतुओं के नाम हैं, वह कोई ना कोई ग्रीक या रोमन मिथकों के नाम पर है।

(२) एक दिन पॉल फेरारो की किताब Pedagogy of Oppressed का रिव्यू नेट पर सुन रहा था, कई लोगों का रिव्यू सुना, और मैंने देखा कि उन रिव्यू में अधिकतर रिव्यू गैर अकादमिक लोगों ने किया है।

(३) चीन के सलेबस में यूरोपीय/अमरीकी चिंतकों को नहीं पढ़ाया जाता है।
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अब लेख शुरू

भारत गुलामों का देश क्यों है और क्यों भारत गुलामों का सबसे बड़ा उत्पादक है और क्यों भारत के अकादमिक संस्थान और लोग ज्ञान के उत्पादन में असफल हैं ??

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ऐसा इसलिए है कि हमने अपने लोक परंपरा, ज्ञान परंपरा, लोक भाषा और संस्कृत भाषा मे स्थापित ज्ञान को ट्रेंड में ला कर स्थापित नहीं किया। हमने अपने ग्रन्थों का पुनर्पाठ नहीं किया।

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इलाहाबाद, बनारस इत्यादि के प्रोफ़ेसरों पर जो भारतीय ज्ञान परंपरा को ट्रेंड में लाने की जिम्मेदारी थी, वह धर्म इन्होंने नहीं निभाया और ना ही इन विश्वविद्यालयों का पब्लिकेशन यूनिट है। BHU का एक ही जर्नल UGC केयर लिस्ट में है।क्या इतने बडे यूनिवर्सिटी का नॉलेज सेक्टर में कंट्रीब्यूशन सिर्फ एक जर्नल तक ही सीमित है ??

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इलाहाबाद यूनिवर्सिटी तो महाभ्रष्ट और अनैतिक अकादमिक लोगों का अड्डा है, यहां से ज्ञान परंपरा का उत्पादन शून्य है।

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देखिए संस्कृत भारतीय ज्ञान परम्परा के अकादमिक और सामाजिक ट्रेंड से कब का बाहर हो चुका है। रही सही बात कुछ हिंदी में थी तो इसमें लिखी गयी अमूल्य पुस्तकें अब बाजार में मिलती नहीं और कोई अंग्रेजीदा प्रोफेसर उसको रेफर नहीं करता। अब तो मात्र अंग्रेजी का ही सहारा बचा है। यूरोप ,अमरीका ने भारत में गूँ की टट्टी ढोने वाले हरम के प्रोफेसरों से हिंदी और संस्कृत,संस्कृति को खूब गाली दिलवाई, यहां की भाषा को नीचा दिखाया और फिर यहां के चिंतकों को नीचा दिखाया और अंत में यहां के सामाजिकी, मानविकी, हिंदी सहित्य का पूरा बाजार अपने लंपट चिंतकों से भर दिया।

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इसलिये माथे में गूँ की टट्टी ढोने वाले प्रोफेसर भी अब उसी पर शोध कराते हैं जिसका साहित्य अंग्रेजी में उपलब्ध हो या फिर वो विचारधारा अंग्रेजों के हरम में पैदा हुआ हो।

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भारतीय अकादमिक जगत में हिंदी में काम करने वाले हताश निराश हैं। धीरे-धीरे भारतीय जर्नल्स को विदेशी जर्नल ऑक्युपाई कर रहे हैं। अभी हाल ही में भारतीय मानव वैज्ञानिक सर्वेक्षण के जर्नल को सेज ने ऑक्युपाई कर लिया और इस दुखद घटना को वहाँ के लोग गर्व से बताते हैं।

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मैं इसलिये कहता हूँ कि भारत में अभी कई बार गुलाम बनने की संभावना खत्म नहीं हुई है। हम गुलाम बनने के लिये ही पैदा हुये हैं।

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आप सोचिये कि यूरोप में हर विश्वविद्यालय के लगभग प्रत्येक डिपार्टमेंट का अपना एक जर्नल है। BHU का हज़ारों करोड़ का अपना बजट है, यहां सोशल साइंस और हयूमैनिटिज़ से कितने जर्नल प्रकाशित होते हैं ???
मैं तो इलाहाबाद विश्वविद्यालय का हूँ, मैं तो जानता हूँ कि इस यूनिवर्सिटी में अकादमिक नैतिकता का समूल नाश हो गया है। लेकिन BHU ये क्या कर रहा है ??

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क्या इस संस्थान ने भारतीय मॉडल ऑफ सोशल साइंस, या अंग्रेजी साहित्य, हिंदी साहित्य, दर्शन, समाजशास्त्र की परिभाषा दी, क्या इन्होंने इन सब्जेक्ट की वेलिडिटी को जांचा-परखा, क्या इन संस्थानों ने BA, MA के सलेबस को भारतीय मानकों के अनुसार परिष्कृत करने का प्रयास किया ??

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आपका संस्थान कितना भारतीय है।यूरोप में वैश्यावृति का ठेका चलाने वाले भारत मे चिंतक बन जाते हैं, नरसंहार करने वाले मसीहा बन जा रहे हैं, और भारत के मनीषी, लोक चिंतक इनके सब्जेक्ट मैटर नहीं बन सकते हैं।

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अंतिम बात यही कहूँगा कि जब प्रोफ़ेसर्स अपनी संवेदना पेट से ऊपर लाएंगे तब ही सृजन सम्भव होगा। तथाकथित ज्ञान के नाम पर गुलामी की टट्टी ढोने से अच्छा है कि अपने मुँह पर सुबह शाम बीस-बीस जूता मार कर प्रयाश्चित करें। गुलाम, नैतिक भ्रष्ट,शिशन से उदर और उदर से शिशन की यात्रा करने वाले भ्रष्ट अकादमिक ।

आदित्यनाथ

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