नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति अप्रासंगिक और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा

बहुप्रतीक्षित नेशनल एजुकेशन पोलिसी २०२० को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी ।यह एक नौ सदस्यीय कमेटी है, जिसमे नौकरशाह, वैज्ञानिक, शिक्षाविद और अकादमिक शामिल हैं। नई शिक्षा नीति की तरफ आरएसएस का शुरू से झुकाव था कि इसमें सुधार हो और इसका निः उपनिवेशीकरण हो l संघ के निः उपनिवेशीकरण का तात्पर्य भारत के आमजनों के मन में बैठे सैकड़ों वर्षों के हीन मनोवैज्ञानिक भावना से मुक्ति ( recovery from inferior psychological feeling) एवं भारतीय मूल्यों की पुनर्स्थापना से राष्ट्रीय गौरव का जागरण है।भारतीय चिंतकों ने समय-समय पर इसे प्राप्त करने के लिए सुझाव भी दिए हैं जिसमें निःउपनिवेशीकरण का लक्ष्य भारतीय शिक्षा पद्धति से गुलामी के उन तत्त्वों जैसे-मैकाले की शिक्षा पद्धति, विदेशी अराजक चिंतकों जैसे मार्क्स, लेनिन, माओ, नोम चोमस्की, डोनिगर, मूलर एवं नृजातीय प्रभुत्ववादी (racial despotism) विचार परम्परा से सम्बंधित चिंतकों को भारतीय शिक्षण पद्धति से हटा कर भारत के चिन्तक जैसे चाणक्य, विदुर, नारायण गुरु, तिरुवल्लुवर, आचार्य हेमचन्द्र, आर्यभट्ट, वराहमिहिर, अक्का महादेवी, शंकराचार्य, गौतम बुद्ध, भार्तिहरी, महावीर, कबीर, पाणिनि, सहित उन हजारों चिंतक जिन्होंने भारत में न्याय, विदेश नीति, मानव व्यवहार, अर्थशाश्त्र, व्याकरण सहित सैकड़ों बहुआयामी ( multidisciplinary) विचारों से भारत को विश्व गुरु का सम्मान दिलाया जाए ।

इस अहर्निश भावना को लेकर आरएसएस पिछले ९० वर्षों से कार्य कर रहा है, संघ के पूजनीय सरसंघचालक, आदरणीय प्रचारक एवं चिन्तक जैसे प्रोफ़ेसर रामस्वरूप, सीताराम गोयल, दीनदयाल उपाध्याय दुनिया से अपने सबसे दुर्लभ और महत्वाकांक्षी सपनों को अपने आगे आने वाली पीढ़ी के कंधे पर सौंप कर चले गये लेकिन राष्ट्रीय शिक्षा नीति के नाम उन सपनों को इतना बड़ा धोखा मिला जिसकी भरपाई अब शायद कभी संभव भी हो पाए । राष्ट्रीय शिक्षा नीति का जब मसौदा तैयार हो रहा था तब पूरे देश में इतना वितंडा खड़ा हुआ जैसे लगा कि अब शायद भारत की नई शिक्षा नीति २०२० के आते आते भारत विश्वगुरु बन ही जाए।लेकिन जब भारत की नई शिक्षा नीति को पूरा पढ़ा तो यह एक ऐसा आदर्शवादी और तुष्टिकरण से प्रेरित मसौदे की तरह लगा l

आदिवासी भाषा आज एक गैर आदिवासी स्टेक होल्डर्स के लिए डेटा से ज्यादा कुछ भी नहीं ?

बाल शिक्षा और माध्यमिक शिक्षा पर इसमें जितने दावे किये गये हैं वो सभी भारत में कमोबेश कागज के स्तर पर पहले से उपलब्ध थे l जहाँ तक भारतीय भाषाओँ में शिक्षा का मसला हो वो शिक्षा अभी भारत में छात्रों को सुलभता से प्राप्त हो रही है l आदिवासियों को उनकी भाषा में शिक्षा का मसला हो वह ओडिशा जैसे राज्यों में वहां की ट्राइबल डवलप एजेंसी उसे दे रही है और सच में आदिवासी बंधुओं को उनके मौलिक भाषाओं में शिक्षा दी जा रही है l संसाधन उपलब्ध हैं, सिर्फ ग्रेट अंडमानी भाषा ही विलुप्त हुई है लेकिन अन्य आदिवासी भाषाओं का पर्याप्त उपयोग हो रहा है l भले ही आज नई शिक्षा नीति में इसके प्रकाशन से कई लोग उत्साहित हों लेकिन यह असाध्य सत्य यह है कि ट्राइबल भाषा में शिक्षा की सुलभता जरुर सुहानी है लेकिन कितने ट्राइबल भाषा में शिक्षा प्राप्त किये लोगों को कम्पनियाँ नौकरी पर रखती है। इस कमिटी के आदरणीय एक्सपर्ट अमरकंटक में काफी लम्बा समय दिए गुरुजन जानते ही हैं ।आदिवासियों की यह भी मांग है कि आदिवासी भाषा की शिक्षा देने वाला भी उसी आदिवासी समूह का हो।आदिवासी भाषाओ में निपुण व्यक्तियों को क्या साफ्टवेयर कम्पनी नौकरी देगी ? वास्तविक अर्थों में आज आदिवासी भाषा, गैर आदिवासी शोधार्थियों के अकादमिक शोध तक ही सीमित हो गया है ।

तो कैसे लडेगा यह शिक्षा नीति उपनिवेशकरण के इतने विशाल ताकत से ?

दूसरी बात ,कमिटी में भारतीय भाषा को देख कर भी कई लोग आह्लादित हैं, लेकिन आप यह सोचिये जब आजादी के बाद भारतीय भाषाओ को नौकरशाही का हिस्सा नहीं बनाया गया, न्यायपालिका का हिस्सा नहीं बनाया गया, मिडिया और प्रकाशन का हिस्सा नहीं बनाया गया तो आजादी के सत्तर वर्षों के बाद कैसे बन पायेगा । संस्कृत में बोलने, लिखने और पढ़ाने वाले अब सिर्फ पूजा पाठ तक सीमित हो गये हैं ।पूरे देश में सिर्फ अंग्रेजी भाषा सिखाने के नाम पर सैकड़ों करोड़ की अर्थव्यवस्था है।बिहार के प्रत्येक जिलों में हजारों की संख्या में अंग्रेजी सिखाने के कोचिंग संस्थान हैं । अंग्रेजी माध्यम स्कूलों के सामने हिंदी माध्यम के स्कूलों को हीन समझा जाता है। सरकारी स्कूलों में आजकल सिर्फ आर्थिक रूप से पिछड़े हुए बच्चे वो भी मुश्किल से पढ़ते हैं ।तो कैसे लडेगी यह शिक्षा नीति उपनिवेशकरण के इतने विशाल ताकत से ? इसके उपाय का इस शिक्षा नीति में कहीं कोई जिक्र नहीं है ।

नई शिक्षा नीति में में दो वैचारिक अवधारणा

नई शिक्षा नीति की उच्चतर शिक्षा में दो वैचारिक अवधारणा का जिक्र किया है, पहला बहुविषयक (Multidisciplinary) और अंतर्राष्ट्रीयकरण (internationalization) । शिक्षा का बहुविषयी अंतर्संवाद तो आज की जरुरत है इससे सहमत हुआ जा सकता है लेकिन इस शब्द का उल्लेख जब नालंदा, विक्रमशिला, तक्षशिला से किया जाता है तो इसके पेडोगोगी पर संदेह लाजिमी है । उपरोक्त विश्वविद्यालय पूरे विश्व में ज्ञान का निर्यातक और उत्पादक था ना कि इसका उपभोक्ता जबकि यहाँ भारतीय ज्ञान परम्परा विदेशों से ज्ञान परम्परा के आयात पर निर्भर है ।आप सन्दर्भ में ऑक्सफ़ोर्ड, हार्वर्ड की भूमिका जब बनाते है तो यह भी देखने का कष्ट करिए कि भारत में इलाहबाद विश्वविद्यालय, पटना विश्वविद्यालय और बम्बई यूनिवर्सिटी के हालातों को भी देख लें

ना सिर्फ यही बल्कि ऐसे कई विश्वविद्यालय जिसकी स्थापना के १०० वर्ष से अधिक हो गये आज या तो वह चलन से बाहर हो गया है बल्कि वहां विश्वविद्यालय के नाम पर सिर्फ दीवारें बची हैं।बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय को ले लें, आप एक तरफ भारतीय शिक्षा में भारतीय भाषाओं का जिक्र करते हैं और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में हिंदी में इंटरव्यू देने वालों पर अट्टहास किया जाता है । BHU सेलेक्शन कमिटी से तो एक छात्र सिर्फ इसलिए उठ कर चला जाता है क्यूंकि उसे हिंदी में अपनी प्रस्तुति देने से रोक दिया गया। यह सोचने वाली बात है कि सत्तर वर्षों में हम भारतीय भाषा में उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने वाले केन्द्रों को हतोत्साहित करने का कार्य किये । अन्तराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा को अगर छोड़ दिया जाये तो कितने ऐसे संस्थान या विभाग है जो आज के दौर में हिंदी भाषा में शिक्षित शोधार्थियों को प्रोत्साहन देते है ?

आज सामाजिक विज्ञान और मानविकी जहाँ विशुद्ध रूप से यूरोपीय और अमरीकी चिंतकों का पाठ्यक्रमों में बोलबाला है बल्कि हिंदी में स्तरीय पुस्तकों के लिए भी छात्रों को जद्दोजहद करना पड़ता है । UGC CARE लिस्ट में कितने जर्नल्स हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं में है जरा इस पर भी विचार कर लें तो बड़ी मेहरबानी होगी ।आपको क्या लगता है कि वैश्वीकरण के इस युग में शिक्षा का भारतीयकरण के लिए इस नई शिक्षा नीति में कोई अंतर्दृष्टि है ? रही बात अन्तराष्ट्रियकरण की तो सामाजिक विज्ञान और मानविकी में अंतर्राष्ट्रीयता के नाम पर जो सामाजिक सिद्धांत आज अकादमिक जगत में प्रचलित हैं उसमे एक भी सिद्धांत भारतीय चिंतन की अवधारणा की पुष्टिकरण नही करता है सिवाय गाँधी के अहिंसा और रणजीत गुहा, पार्थ चटर्जी, होमी के भाभा के द्वारा स्थापित सबाल्टर्न अवधारणा के ? हालाँकि ये लोग भी पोस्ट कोलोनियल चिंतन की अवधारणा कोलोनिअलिज्म की चादर ओढ़ कर ही किये हैं ।भारतीय मूल के विदेशी चिन्तक जैसे अर्जुन अप्पादुरई जैसे लोगों ने भले ही सामाजिक सिद्धांतो को स्थापित किया लेकिन क्या भारत के मूल में अवस्थित चिंतनधारा का विकास इस वैश्वीकरण के अंतर्प्रवाह में अपनी महत्ता सिद्ध कर पाएंगे जबकि भारत का पाठ्यक्रम मूल रूप यूरोपीय और अमरीकी अराजक चिंतकों का पनाहगार है ।

स्वायत्तता से नवउपनिवेशीकरण

नई शिक्षा नीति २०२० में स्वत्यात्ता की बात जोर शोर से की गयी है साथ ही इसमें फिलेंथ्रोपिक फेलोशिप की व्यापक अवधारणा पर बल दिया गया है । जबकि पूरी दुनियां सहित भारत में इसके बड़े गहरे प्रमाण मिलते हैं कि ऐसे शैक्षणिक स्वायत्तता और फिलेंथ्रोपिक फेलोशिप के नाम पर देश में अलगाववाद की नीव डाली गयी। टुकड़े-टुकड़े गैंग और दक्षिण में अकादमिक अलगाववाद के दुष्परिणामों की व्याख्या राजीव मल्होत्रा अपने पुस्तक भारत विखंडन में विधिवत करते हैं । क्या भारत की नयी शिक्षा नीति के प्रणेता ऐसे अलगावादी गतिविधियों से परिचित नहीं थे ? जिसने भारत में शोध प्रोजेक्ट्स के माध्यम से यहाँ जातीय, भाषाई, धार्मिक और क्षेत्रीय अलगावाद की जड़ें इतनी गहरी कर दी है जिससे निपटना आज भारत के आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के लिए संकट उत्पन्न कर दिया है । एक अमेरिकी सामाजिक वैज्ञानिक थी जिसका नाम रुथ बेनेडिक्ट है, द्वितीय विश्वयुद्ध में जब अमरीका को जापान पर परमाणु हमला करना था तब उन्होंने इनसे वहां के समाज का अध्ययन कराया, जो कि the chrysanthemum and the sword के नाम से प्रकाशित हुआ उसमे रुथ बेनेडिक्ट ने बताया है कि जापानी गुलदावदी के फूल की तरह कोमल और तलवार की तरह कठोर होते हैं, इस अध्ययन के तदोपरांत अमरीका ने जापान पर परमाणु हमला किया था । ठीक इसी तरह शीत युद्ध के समय जार्ज ओरवेल की पुस्तक एनिमल फार्म को अमेरिका ने रूस के खिलाफ बम की तरह इस्तेमाल किया था ।भारत वैसे उन्नीसवीं शताब्दी से ही पश्चिमी देशों के प्रयोग की भूमि है, क्या मार्क्सवाद और माओवाद की विचारधार आज भारत को हजारों जख्म नहीं दे रहे हैं ? भविष्य में ज्ञान को वीभत्स हथियार बना कर लड़ने की प्रवृति और भी बलवती होगी अतः नई शिक्षा नीति जहाँ एकतरफ मैकाले 2.0 को प्रतिपुरित करती है वही यह आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के लिए भी प्राणघातक है । इसलिए सरकार इन बिन्दुओं पर गहनता से विचार करे और शिक्षा नीति को राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों की दृष्टि से देखते हुए इसमें गंभीर संशोधन की ओर विचार करे ।

आदित्यनाथ

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