संघ की अंतर्यात्रा : गुणवान से सामर्थ्यवान की ओर

संघ के बड़े प्रचारक कैसे सोचते हैं ?

संघ एक महान संगठन था। इस संगठन में पहले बहुत ही त्यागी और तपस्वी लोगों ने अपना जीवन लगाया। पहले के जमाने मे ऐसा नहीं होता था कि संघ अपने कार्यकर्ताओं को गुणवान बनने की सलाह देता था और किसी महत्वपूर्ण दायित्व के लिये सामर्थ्यवान लोगों को चुन लेता था। लेकिन अब संघ अपने स्वयंसेवकों को तो गुणवान बनने की सलाह देता है लेकिन जब उनको किसी का चुनाव करना होता है, जैसे कुलपति बनाना तो वह सामर्थ्यवान लोगों को चुन लेता है।

मतलब अब संघ के कथनी और करनी में जमीन आसमान का अंतर आ गया है। आप गुणवान और सामर्थ्यवान का अंतर समझते हैं। इतना अंतर आ गया है। आरएसएस को लगता है कि स्वयंसेवक सिर्फ शाखा लगाएं। क्योंकि वह जानते हैं कि शाखा लगाने से कार्यकर्ता बैल बुद्धि के हो जाते हैं।

आज के जमाने में गुणवान बनना बहुत मुश्किल कार्य है। ये तो संघ के भाऊसाहेब भी जानते हैं। लेकिन सामर्थ्यवान बनना आसान है। यहाँ सामर्थ्यवान का मतलब भ्रष्टाचार के एक संगठित गिरोह का मुखिया होना है। यहां सामर्थ्यवान का मतलब आपके पास कोई एजेंसी हो, महंगी गाड़ी हो लेकिन भड़काऊ ना हो, जैसे ऑडी, हौंडा सिटी, आप ठेकेदार हों , गनर रखते हों लेकिन उसका कोई दिखावा ना करते हों। चन्दन-टीका लगाते हों, ज्यादा लबर लबर ना करते हों, मतलब प्रचारकों को फील कराइये कि उनके सामने एक सामर्थ्यवान आदमी कुत्ता बन के खड़ा है।

समर्थवान का मतलब इतना हो कि आपके पास पैसा हो, हाँ खून दाग हों लेकिन ज्यादा ना हों, आप बदनाम ना हों ज्यादा ? लेकिन आप दो चार दस लोगों को भोजन के लिये तुरत जेब से पांच दस हज़ार भाईसाहब के सामने ही किसी को धीरे से पकड़ा दें।

भाईसाहब को फॉर्च्यूनर पसंद नहीं होती है, भाईसाहब को हौंडा सिटी टाइप की गाड़ी पसंद है। गाड़ी छोटी हो, उसमे स्पेस हो। पतला लेनिन का कुर्ता ज्यादा भड़काऊ ना हो, इस टाइप की व्यवस्था प्रदान करने वाले सामर्थ्यवान लोग। गाड़ी तो मिनिमम हो ही, इसके बिना आज के जमाने मे संघ कार्य असम्भव है।

सामर्थ्यवान का एक और मतलब है, आप किसी बड़े ब्यूरोक्रेट के पति हों या पत्नी हों, तब भी आप सामर्थ्यवान हो सकते हैं। संघ आपको तुरंत प्राथमिकता देगा।

और अगर आपके पास ये सब कोई क्राइटेरिया नहीं है, तब आप कम्युनिस्ट हों, आरएसएस कम्युनिस्टों से बहुत डरते हैं। बहुत भय खाते हैं। इसलिये अगर आपके पास कुछ नहीं है और अगर आप कम्युनिस्ट हैं तो तब भी आपको आरएसएस सामर्थ्यवान मानेगा।

संघ का मूल दर्शन “समरथ को नहीं दोष गोसाईं‘ है। इसलिये गुणवान और सामर्थ्यवान का अंतर समझे रहिये।

आदित्यनाथ तिवारी

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