शीर्षक: पॉपुलिज़्म से चिढ़ क्यों ?

सोसल मीडिया ने एंगर को पोलाइट और पावरफुल लोगों से हटा कर आम आदमी की तरफ फिक्स कर दिया है।

नोम चोम्स्की से एक पत्रकार ने पूछा कि इस दशक का कम्युनिस्ट एजेंडा क्या है ? तो चोम्स्की ने कहा कि फेमिनिज्म ! अब दुनियाँ भर के लेफ्ट राइट विंग पॉपुलिस्म की आलोचना कर रहे हैं; और इसे 21 वी शताब्दी का एजेंडा बना रहे हैं।

सामुदायिक जनजागरण एक ग्लोबल फेनोमेना है। यह भी ग्लोबलाइजेशन का ही बाई प्रोडक्ट है। एक जागरूक आदमी को क्या खाना चाहिए और क्या नहीं, यह वही तय करता है। लेकिन न्यू लेफ्ट अप्रोच कम्युनिटी को पहले ड्रग्स की सुई लगाते हैं, फिर उनके पास अपनी मेनू परोसते हैं।

यही कारण है कि दुनियाँ में अराजकता का जो मूल्य है, भारत मे राइट विंग जागरूकता के मूल्य से जुदा है। यहाँ हिन्दू कुछ मिसिंग को रिकलेम करना चाहते हैं। हर हिन्दू को लगता है कि वो कुछ मिस करता है।

वो चाहे भाषा की बात हो, मंदिर की बात हो या समाज की बात हो। हम हर जगह कुछ मिस करते हैं। इसलिये हिन्दू इस मिसिंग एलिमेंट्स को रिकलेम करना चाहता है।

कुछ मंदबुद्धि अकादमिक को लगता है कि यह इन्टॉलरेंस को बढ़ावा देगा। लेकिन उस मंदबुद्धि अकादमिक को पता होना चाहिए कि राइट विंग जो चाहता था, उसे उसके विरोधियों ने भारत की जड़ों तक पहुंचा दिया।

Noreena Hertz की 8 सितंबर 2020 को, लोनलिनेस पर जो किताब आई है, उसमें इसी न्यू लेफ्ट की बैचेनी की झलक साफ दिखती है।

आज मालूम होना चाहिए कि फेमिनिज्म की डिबेट से ज्यादा ग्लोबलाइज़ेशन और एजुकेशन इंडेक्स ने औरतों का भला किया है। लेकिन इस बात में जब कोई यह कहकर टांग अड़ाता है कि फेमिनिज्म, गोलाबालिजेशन का ही प्रोडक्ट है तब मुझे उससे चिढ़ हो जाती है।

यूरोप, अमरीका या जेहादी इस्लामिक मुल्कों की कंडीशन्स पर सोचे गए विचारों में अलग तरह की समस्या है। यह एक मध्ययुगीन चिंतन है कि पॉपुलिस्म से दुनियां को नुकसान है। आप बर्बोडेस जैसे एक छोटे से देश के संविधान से महारानी एलिजाबेथ को प्रथम नागरिक के तौर पर हटाने (2020) को आप क्या कहेंगे ? पॉपुलिस्म या Decolonization ? या आत्म सम्मान की स्थापना ?

अब दुनिया बदल गयी है।

आदित्यनाथ तिवारी

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