बेटी को न्याय दिलाने के नाम पर हिन्दू घृणा का कारोबार

बेशक इस देश की बेटी हत्या और बलात्कार की शिकार हुई है। गुस्सा स्वाभाविक है। इस देश में ऐसे ही हज़ारों बेटियाँ मारी जाती है। लेकिन ऐसा नहीं है कि हत्यारे सवर्ण ही होते हैं, कई हत्यारे दलित भी होते हैं। अन्य पिछड़ी जातियाँ भी होती हैं।

लेकिन जो घिनौनी बात यहाँ दलित आवाज के नाम पर लिखी गयी है, वह अत्यंत ही घृणास्पद है। मनुस्मृति (पहली बार दलित चिंतकों के मुँह से सुना था), रामराज्य, हिन्दूराष्ट्र इन सब विषयों की आड़ में अगर आप आंदोलन बेचेंगे तो यह निहायत ही घटिया कायरता स्वीकार नहीं है।

मैं ऐसे सैकड़ों मामले जानता हूँ, जहाँ इनके मुंह मे दही जम जाता है। एक दो नहीं सैकड़ों संकलित मामले हैं। आपको अपनी बात कहनी है कहिये लेकिन धर्म को आड़े मत लाइये।

अभी कुछ समय पूर्व ही राजस्थान के सीकर में एक बालिका से दुष्कर्म हुआ तत्श्चात उसकी नृशंसता से हत्या कर दी गयी ,लड़की जाट थी , जब तक हत्यारों का पता नहीं चला दलित चिंतकों ने घटना के नाम पर हिन्दू धर्म को गाली बकना शुरू कर दिया। मनुस्मृति, रामराज्य, हिन्दू धर्म, वेदों का पाखंड इत्यादि से पूरा राजस्थान भर गया परन्तु बाद में जैसे यह पता चला कि हत्यारे का नाम बसन्त मीणा है ,सभी जगह सन्नाटा पसर गया और सामाजिक न्याय की लड़ाई तेल लेने चली गई। इसलिये हिन्दू धर्म का आड़ मत लीजिये, प्रमाण मांगेंगे तो हज़ार प्रमाण दूंगा। जब ऐसे हिन्दू घृणा से भरे लोगों ने दलितों के साथ हुए अत्याचारों पर चुप्पी साधी है।

डूंगरपुर के आंदोलनकारियों से सीखिए कि उन्होंने क्या सबक सीखा, पथलगढ़ी के आंदोलन से सीखिए कि उनका क्या हो रहा है।

विरोध का आड़ लेकर हिन्दू घृणा, हास्यास्पद है। और इससे यह मालूम होता है कि यहां बेटी को न्याय दिलाना नहीं बल्कि हिन्दू विरोध आपका लक्ष्य है।

बेटी के न्याय की लड़ाई को जातीयता और दलबन्दी में मत बांधिए ।न्याय के लिए लड़िये ,न्याय के नाम पर हितसाधन के लिए नही।

हाथरस के मामले में कई गलतियाँ हुई।

पहला पुलिस शुरुवाती शिकायत को गंभीरता से नहीं लिया , दूसरा-अपराधियों पर त्वरित कार्यवाही नहीं हुई। तीसरा- सच को छुपाया गया और चौथा- परिवार की अनुमति के बिना अंतिम संस्कार हुआ।

इन बातों की आलोक में राजनीति हुई। सवर्ण सेना अपराधियों को न्याय देने निकल पड़ी और दलित सेना हिन्दू धर्म के खिलाफ इसे मुद्दा बनाने लगी।

हाथरस की निर्भया को न्याय मिलना चाहिए। अपराधियों को फांसी से कम कुछ भी स्वीकार नहीं है। प्रदेश में ऐसे सभी मामलों की पड़ताल की जानी चाहिए और उनका निपटारा किया जाना चाहिए।

एनकाउन्टर, हत्या, बलात्कार और ध्वस्तीकरण में जाति और धर्म ढूंढने वाले अराजकतावादी पर भी सख्त कार्यवाही होनी चाहिए।

बेटी को बेटी मानिए तभी बेटियों को सुरक्षित वातावरण देने की लड़ाई सफल हो पाएगी।जाती देखने पर मात्र हित साधे जा सकते हैं न्याय नही

आदित्यनाथ तिवारी

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