बलात्कार की राजनीति

बलात्कार और बलात्कार के साथ नृशंस हत्या इस देश में प्रतिदिन होती है। लेकिन निर्भया या हाथरस जैसे प्रतिशोध का जन्म तब होता है जब अन्याय की पराकाष्ठा बढ़ जाती है।

पुलिस प्रशासन की लापरवाही, महिलाओं को एक आर्थिक इकाई और पुरुषों का पागल हवसी व्यवहार ,यह तीन ऐसे मुद्दे हैं जो Perpetual हैं।

लड़कियाँ कबतक अपनी आबरू की रक्षा करे। चीर हरण तो ऐतिहासिक काल से होता आया है और ऐसे चीर हरण के खिलाफ पुरुषों को खड़ा होना चाहिए।

बाहुबली में जो दिखाया गया है कि स्त्री अपराध करने वालों का सर काट लेना चाहिए। वो सही है। सरकार को इसके प्रावधान कड़े करने चाहिए। बलात्कारियों की गाड़ी पलटनी बहुत आवयश्क है।

पुलिस भी क्या करे। उसका पूरा पालन पोषण समझौता संस्कृति में होता है। नेता अनावश्यक ऐसे पुलिस पर ब्रूटल हो जाते हैं।

योगी जी के साथ भी यही है। “एक भी अपराधी बख्शे नहीं जाएंगे”, ये ठीक है मुख्यमंत्री साहेब एक भी अपराधी बक्शे नहीं जाएंगे। लेकिन पहले अपने पुलिस को संवेदनशील मामलों में मुकदमा तो लिखने की आदत लगाइये।

मामला कभी कभी आपसी रंजिश का भी हो जाता है। पुलिस कंफ्यूज रहती है कि लड़ाई असली है या मुखिया के कहने पर कहानी बनाई गई है।

लाशों पर राजनीति होनी चाहिए। कोई बुरा नहीं है, राजनीति की अपनी ताकत होती है। लेकिन जो मुझे सबसे बुरा लगता है कि लोग Selective हो जाते हैं।

FCRA प्रतिबंधों से पीड़ित देश विरोधी ताकत जब ऐसे आंदोलन में घुसते है तो यह मामला बिला वजह हिन्दू विमर्शों के इर्द गिर्द आकर सिमट जाता है। जबकि धर्म को घसीटने से कुछ लाभ तो नहीं मिलता बल्कि यह ऐसे लोगों को कायर बना देता है जब बलात्कारी मुसलमान, ओबीसी, दलित हो।

इनके खिलाफ ऐसे संगठनों, फर्जी फेसबुक अकॉउंट, ट्विटर अकॉउंट से आवाज नहीं उठती है। अजित भारती सही कहते हैं कि मुद्दा तब ही बनेगा जब दलित और सवर्ण का डायलेक्टिक्स हो। दलित ओबीसी, दलित मुसलमान या दलित दलित में ऐसे मुद्दे नहीं बनते बल्कि कम्परमाइज़ हो जाते हैं।

आदित्यनाथ तिवारी

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