मातृभाषा विहीन बचपन, वियाग्रा पर सम्पूर्ण यौवन

इतने बरिस उत्तर प्रदेश रहा, सड़क पर कभी किसी पिता को अपने छोटे बच्चे से अंग्रेजी में बतियाते नहीं सुना। वो भी इंस्ट्रक्शन देने के संदर्भ में..छोटे छोटे इंस्ट्रक्शन के लिये उत्तर प्रदेश में अंग्रेजी दा लोग भी अंग्रेजी में संदेश नहीं देते हैं।

हाँ कुत्तों को देखा है, अंग्रेजी में इंस्ट्रक्टर देते हुए। “रॉकी” कम हियर, जॉनी स्टॉप, जॉनी मूव, मतलब कुत्तों को छोटे छोटे इंस्ट्रक्शन देते हैं लोग।

माफ करियेगा, मैंने बिहार में बहुत दिनों से अंग्रेजी से हताश होते हुये लोग देखे हैं। पागलपन लिए हुये, घटिया स्तर का अंग्रेजी जबकि बिहारी हिंदी अच्छा बोल लेते हैं। पहले भी ऐसा नहीं था कि बिहारी अंग्रेजी नहीं जानते थे। बहुत से बिहारी अंग्रेजी जानते थे, अच्छी अंग्रेजी जानते थे और हैं भी लेकिन गैर जरूरी जगहों और अनावश्यक अवसरों पर अंग्रेजी झाड़ते मैनें कभी बिहारियों को नहीं देखा ।

लेकिन आज जो कि मैं कई दिन से अनुभव किया, अपने सगे सम्बंधियों से लेकर, परिचितों और अपरिचितों को अंग्रेजी में इंस्ट्रक्शन देते हुये। वो भी छोटे छोटे बच्चों को। वही कुत्तों जैसी वाली अंग्रेजी …स्टॉप, मूव, कम, गो .. Etc

आज का वाकया बताता हूँ, एक अधेड़ उम्र का मोटा आदमी, अपने दौडते हुये छोटे छोटे बच्चों के रुक जाने पर कहता है, कि “STOP (! विस्मयादिबोधक) Why ?” मतलब वो कहना चाह रहा था कि रुक क्यों गए ! दौड़ो ? अब नेटिव अंग्रेजी बोलने वाला इसे कहेगा “Move on” या Come on …Go ahead, या फिर Bravo/Baby ..Here we Go, या कुछ भी कह सकता है।

मुझे समझ नहीं आता बिहार में अंग्रेजियत की ऐसी अराजकता क्यों फैली है ? जबकि उत्तर प्रदेश में बिहार की तुलना में कई अच्छे विश्वविद्यालय हैं। अंग्रेजी के कई महान लेखक हुए, इलाहाबाद हाईकोर्ट इतना बड़ा है। काम काज अंग्रेजी में ही होता है। लेकिन फिर भी वहाँ शहरों से लेकर गांवों में हिंदी के प्रति ऐसी हैवानियत नहीं देखी।

कंपनी बाग में इलाहाबाद के तथाकथित भद्रलोक घूमते हैं। हम किसी का प्रोफ़ाइल नहीं नापे कभी, मैं भी यदा कदा अपने मुफ़लिस यार दोस्तों के साथ घूमने जाता हूँ। लेकिन मैं इतना तो जरूर मानता हूं कि शहर के जहीन लोग वहां घूमने जाते हैं। मैंने कभी भी वहाँ अच्छी या बुरी अंग्रेजी में बच्चों को कुत्ता बनाने वाले इंस्ट्रक्शन देते हुये लोगों को नहीं देखा।

आप कहेंगे कि आपका कितने सेंपल पर ये स्टडी है। तो हम कहते है कि पटना का गाँधी मैदान , चिड़िया घर से लेकर मेरे गृह जनपद तक एक ही हालात हैं। पटना चिड़िया घर मे सुबह के समय का माहौल और इंस्ट्रक्शन दोनों कंपनी बाग टाइप ही था। लेकिन बाँकी जगह जो जाहिलियत मैं देख रहा हूँ। उससे बड़ी घृणा आ रही है।

हम भी बिहारी हैं, बिहारी अस्मिता को तार तार होते मैं देख नही सकता । फ़िराक़ गोरखपुरी अगर आवारा नही होते तो इलाहाबाद को हरामजादा नही कहते। और मैं अगर बिहारी हूँ, तो घिन्न आती है ऐसी जाहिल हताशा से भरे लोगों पर जिसने अंग्रेजियत के अधजले माँस से अपने खूबसूरत बच्चों को हरम की गुलामी सिखा रहे हैं।

बच्चों को जीने दो, उसे उसकी मातृ भाषा में शिक्षा दो, क्यों हरामी की नस्ल बना रहे हो, भारतीय भाषाओं की शिक्षा दो कोढ़ के खाजो, अंग्रेजी वो सीख लेंगे,इको सिस्टम है उसका, बनारस जा कर देखो, भीख मांगने वाले भी चार भाषाएं जानते हैं।

मातृ भाषा मे शिक्षा दो जाहिल, बच्चों से उसका बचपन छीना, दादा दादी, उसकी कहानियां छीनी, नाना नानी, शुद्ध दूध दही, छाछ छीना, मुहल्ले के दोस्तो को छीना, प्रकृति का प्यार छीना, अब उसका भाषा भी छीन कर क्या उसे वियाग्रा भोगी पुरुष बनाओगे ?

नोट: यह हर हताश हिन्दीभाषी राज्यों के हताश माँ बाप पर लागू है।

आदित्यनाथ

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