मद्यपान की अहर्ता, उपलब्धता नहीं, संस्कार है।

आदिवासी समाज मे दारू का बहुत ही महत्व है। इन समाजों में कई प्रकार के दारु प्रचलित हैं। लेकिन सबसे मुख्य और सम्मानित दारु महुवा का बनाया जाता है। महुवा का दारू बहुत ही शक्तिवर्धक होता है। महुवा के दारू में गजब की आध्यत्मिकता होती है। उसके बाद आदिवासी भाई बंधु चावल को प्रसंस्करित करके हँड़िया दारू बनाते हैं। हँड़िया थोड़ा निम्न श्रेणी का दारू है। इस दारू से जल्दी और तेज नशा पकड़ता है। जबकि महुवा अपना असर धीरे धीरे डालता है।

महुवा और हँड़िया के बाद ताड़ी, खजुरी और सलपु (सैगो पाम) भी उच्च श्रेणी का द्रव्य है। ताड़ी और खजूरी तो आमतौर पर मुख्यधारा के समाज मे भी मिल जाता है। लेकिन सलप (सैगो पाम, ओडिशा) का स्वाद हीरा होता है। ताड़ी, खजुरी और सलपु को लोग ताजा ताजा इस्तेमाल करते हैं। सलपु (सलप) ना सिर्फ एक रस है, बल्कि एक पूरी की पूरी संस्कृति है।

उपरोक्त द्रव्यों (हँड़िया को छोड़कर) को मजबूत शरीर वाला, शालीन व्यक्ति और सभ्य समाज ही धारण करके उसे पचा सकता है। आदिवासी समाज के खूबसूरत लोग, उपरोक्त द्रव्यों को व्यसन के लिये इस्तेमाल नहीं करते हैं।

उपरोक्त महान द्रव्यों का उत्पादन जबतक कम्युनिटी स्तर तक था, तबतक इसकी खूबसूरती बरकरार थी। लेकिन जैसे ही इसके उत्पादन में बाहरी तत्वों (डिटेल में लिखूंगा तो लोग कहेंगे मनुवादी है) की एंट्री हुई, यह एक व्यसन बन गया। और मुख्यधारा के जल्दी बूढ़ा हो जाने वाला समाज इसे बदनाम कर दिया।

मैंने अपने शोध के दौरान और अन्य राज्यों में ट्राइबल क्षेत्रों के अनुभवों के आधार पर यह दावा करता हूँ कि मैंने आजतक किसी भी आदिवासी को उपरोक्त जीवनदायिनी द्रव्य का सेवन करके गाली गलोज करते नहीं देखा है।

उपरोक्त महान द्रव्यों को ग्रहण करके आदिवासी समाज बहुत गहरे में उतर जाते हैं। जंगल मे पहाड़ के ऊपर सखुवा के आग के चारों तरफ ढोल की थाप पर बाहों में बाहें डाल कर गीत गाते हुये आदिवासी समाज प्रकृति का उत्सव मनाते हैं।

यह एक पौराणिक गाथा है। अंतहीन कहानी है। आज याद आया तो लिख दिया। (काजू और बाँस के कोमल शूट्स का भी दारू बनाया जाता है।)

कहानी लंबी हो जाएगी शार्ट कट में बताता हूँ, नागालेंड में जब अमरीकी मिशनरी जब ईसाई मत का प्रचार कर रहे थे। तो उनके एवेंजिलिकाल कोड ऑफ कंडक्ट में नागाओं को शराब से पूर्णतया दूर रहने को कहा गया था। चर्च के फादर ऐसे नागा (मुख्य रूप से सूमी) समुदायों को चर्च में उसका संस्कृतिकरण करते थे।

और ऐसा नहीं करने पर उनको पनिष करते थे। खैर शॉर्टकट में यह बताऊं कि मिशनरी ने स्वर्ग नरक के अलावा नागालैंड के आदिवासी समाज Drinker and Non-Drinkers में बांट दिए। वो दारू जो नागाओं के संस्कृति का अभिन्न अंग था। वो दारू जिससे उनके देवताओं और दानवों की आराधना होती थी। मिशनरियों ने उसे ही टैबू बना दिया। जैसे आजकल भगवतगीता, रामचरितमानस को निकृष्ट मानसिकता से ग्रसित होकर टैबू बना दिया है। तमाम तरीके के झूठे तथ्य और मिथकों से जोड़कर …..सीता राम सीता राम

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