संघ और बामपंथ की आंतरिक स्वार्थपरायणता

प्रोफेसर बद्रीनारायण की एक पुस्तक 5 अप्रैल को बाजार में आ रही है। इस पुस्तक का प्रकाशक पेंगुइन है। वही जहाँ से विंडे डोनिगर का हिंदुओं पर घृणास्पद पुस्तक प्रकाशित हुआ था।

चूंकि प्रोफेसर बद्रीनारायण जी एक सामाजिक चिंतक हैं और आरएसएस एक हॉट टॉपिक है, और प्रोफेसर साहब हाल के कुछ दिनों में आरएसएस के कुछ बड़े प्रचारकों को अपने बाड़े में बांध रखे हैं।इसलिये एक central leftist व्यक्ति के लिये इसपर लिखना लाजिमी हैं।

प्रोफेसर बद्रीनारायण जी ने संघ के भोले-भाले प्रचारकों को एक डेटा सेट की तरह अच्छा इस्तेमाल किया है। संघ का इससे अच्छा इस्तेमाल कोई भी बुद्धिजीवी नहीं कर सकता है।

चूँकि इससे पहले भी प्रोफेसर बद्रीनारायण ने आरएसएस , रामलीला और दलित, लोक इतिहास जैसी बातों से आरएसएस की समालोचना करते आये हैं।

आरएसएस को एक चतुर, चालाक और भारतीय लोकतंत्र को खतरा बताने वाले प्रोफेसर बद्रीनारायण जी आरएसएस के बड़े प्रचारकों के काफी करीब हैं। बेशक प्रोफेसर बद्रीनारायण सर का आरएसएस के करीब जाना एक दुस्साहसी रणनीति रहा हो लेकिन आरएसएस के प्रचारक तो प्रोफेसर बद्री नारायण के इसलिये करीब गए क्योंकि आरएसएस पर एक बौद्धिक रूप से कुंठित NGO का आरोप लगता आया है।

आरएसएस के प्रचारक जब प्रोफेसर बद्रीनारायण जैसे सम्मानित Central left और सत्ताभूत (moving towards political power) प्रोफेसर से बात करते हैं या ऐसे संस्थानों में अपना बौद्धिक देते हैं तो आरएसएस के प्रचारकों को ऐसा लगता है कि वो बामपंथ को जीत लिए। बामपंथी उनके सामने छोटा हो गया।

और इन सभी बातों के बीच अगर ऐसा सेंट्रल बामपंथी प्रचारकों का नंबर मांग कर सेव कर ले और अपने लेखों को भेजकर आरएसएस की अहंकारिक तुष्टीकरण करने लगे तो आरएसएस के प्रचारक पिघल कर भाप बन जाते हैं।

और ऐसे बुद्धिजीवियों को कहते हैं कि बताओ वत्स तुम्हें क्या चाहिए ? और खुश होकर प्रचारक ऐसे नवोन्मेषी ज्ञानियों को कुलपति, डायरेक्टर और बड़े बड़े प्रोजेक्ट इत्यादि देकर यह उम्मीद करने लग जाते हैं कि एक बामपंथी को राष्ट्रवादी बना दिया।

मुझे याद है जब G P Pant social science institute, में प्रोफेसर साहब किसी आरएसएस के प्रचारक का कार्यक्रम करवाते थे, तो उसके पहले आरएसएस के कार्यकर्ताओं को कार्यक्रम का मैसेज और कॉल जाता था। वहाँ स्वयंसेवक तो पूरी भक्ति भाव से प्रचारकों को सुनते थे।लेकिन वहीं GB Pant के छात्र प्रोफेसर बद्रीनारायण को तो जो कहते थे वो तो कहते ही थे लेकिन आरएसएस के प्रचारकों को इतनी भद्दी-भद्दी गालियाँ और इतना मजाक उड़ाते थे कि जिन बातों को याद करने से ही शर्म आती है।

कार्यक्रम में बाहर से सबकुछ नार्मल रहता था लेकिन बाद में आरएसएस के प्रचारकों की रिकॉर्डिंग सुनकर लोग इतना मजा लेते थे जिसका अंदाज़ा लगा पाना मुश्किल है। मैंने तो एक लड़के को यह भी बोलते सुना कि आरएसएस के प्रचारकों को एक बामपंथी मंच दे दो, उनके स्वयंसेवकों को भरपेट खाना ये आपके सामने बंदरों की तरह नाचने लगेंगे।

अभी प्रोफेसर बद्रीनारायण जी ने आरएसएस पर एक पुस्तक लिखा है। Republic of Hindutva : How the Sangh is Reshaping Indian Democracy.

हालाँकि यह बाजार में 5 अप्रेल को आएगी। चूँकि भारतीय लेखकों को पेंगुइन में किताब पब्लिश करने के लिये अपना जमीर बेचना पड़ता है तो जाहिर सी बात है कि इसमें पब्लिशर्स शर्त तो शामिल होंगे ही लेकिन इस पुस्तक के विवरण में लिखा है। “instead of wiping out caste from electoral politics, The RSS plays up the identity of disadvantaged groups, which translates into votes for the BJP.

मतलब यह हुआ कि इक्कसवीं शदी में जहाँ एक तरफ भारतीय राजनीति से जाति के विमर्श को समूल नाश करने की तरफ भारत कदम बढ़ाने को आतुर है वहीं आरएसएस बहिष्कृत, दलित, वंचित लोगों के पहचान की राजनीति को संघी साँचे में ढाल कर एक भावुक खेला करके इसे भाजपा के लिये वोट बैंक की तरह इस्तेमाल कर रही है।

अर्थात भाजपा का हिंदुत्व आरएसएस के इमोशनल गेम प्लान का वह हिस्सा है जहाँ आरएसएस वंचित शोषित दलीत लोगों को हिंदुत्व के मिथकीय बहकावे में लाकर उसे भाजपा के लिये उपयोग की वस्तु बनाती है।

अगर इसकी मीमांसा की जाए तो इसका रीड बिटवीन दा लाइन यह हुआ कि आरएसएस जो दशकों से त्याग, तपस्या, बलिदान कर रही है। संघ के स्वयंसेवक जो केरल, बंगाल, तमिलनाडु, असम या अन्य जगहों पर अपने प्राणों की आहुति दे रहे हैं। वह महज एक गेम प्लान है।

यानी पूजनीय हेडगेवार जी और गोलवलकर जी ने संघ की स्थापना राजनैतिक हित और वंचितों शोषितों को यूजफुल इडियट बनाने के लिए किया था। या नहीं तो संघ की स्थापना भले ही निर्विकार भाव से किया गया लेकिन अब आरएसएस वंचित शोषितों को मुनक्का बना कर बस इसका राजनैतिक फायदा भाजपा को पहुंचा रहा है।

दूसरी बात, पेंगुइन प्रोफेसर बद्रीनारायण जी के research methodology के बारे में लिखता है कि ” Drawing on extensive field research in the heartland of Uttar pradesh, this path breaking book shows how through well-planned strategies of appropriation and social work, Hindutva forces are radically reshaping Indian democracy”

सबसे पहले तो मैं प्रोफेसर बद्रीनारायण के काम को extensive Field research की श्रेणी में नहीं रखता हूँ। प्रोफेसर बद्रीनारायण ने आरएसएस के द्वितीय वर्ष, तृतीय वर्ष के डेटा का कोई उपयोग नहीं किया होगा। हाँ प्रथम वर्ष में एक आध दिन जाकर वहाँ observe किये होंगे। इस आधार पर यह extensive field research नहीं है। और ना ही प्रोफेसर साहब संघ के किसी भी शाखा में वर्ष भर भी नियमित गए हैं।

आरएसएस पर यह इनका etic अध्ययन है जो कि ग्लोबल बुद्धिजीवी के नैरेटिव को सूट करता है। प्रोफेसर साहब का यह काम इनके आरएसएस के सीनियर प्रचारकों को डेटा सेट की तरह इस्तेमाल करके और कुछ इंटरव्यू और non participant observation के तौर पर किया गया है। अतः इसे extensive कहना सर्वथा अनुचित और प्रोपेगंडा बेचने के लिये किया गया है।

इस झूठ को प्रकाशक अपने डिस्क्रिप्शन से हटाए नहीं तो प्रॉपर कार्यवाही की जाएगी। इस पुस्तक का इंतज़ार है। अगला कई रिव्यू पढ़ के दूँगा। ये अभी शुरुवात है।

लेकिन अंत में यही कहूंगा कि वर्तमान पुस्तक उन प्रचारकों के विमर्श की निष्पति है जिन्होंने GB pant. Social science institute में जाकर ज्ञान दिया और अपने पुस्तकों का विमोचन किया। Data के triangulation के लिये भी वही प्रचारक जिम्मेदार हैं।

मुझे बहुत उत्साह है, जब यह पुस्तक मेरे हाथ आएगी तो मैं पुस्तक और लेखक का प्रमाण सहित Historical reconstruction करूँगा।

लेखक : आदित्य नाथ

शोधछात्र इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रयागराज

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