क्या आरएसएस उस कोयल की तरह है जो मीठी-मीठी बातें बोलकर कौवे के घोंसले में अपना अंडा रख देता है ?

वर्ष २०१९ में प्रयागराज में कुम्भ का आयोजन हुआ था l इस कुम्भ पर्व का मुख्य आकर्षण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रेरित और कमोबेश इसी के तत्वाधान में संचालित नेत्र कुम्भ था । संघ के प्रति एक स्वाभाविक लगाव और कुम्भ को एक डेटा सेट की तरह देखने के आदत के कारण मुझे नेत्र कुम्भ जाने की बहुत इच्छा थी । नेत्र कुम्भ आरएसएस के द्वारा आयोजित एक ऐसा सेवा कार्यक्रम था जिसमें देश भर के 27 अस्पतालों के 400 चिकित्सक और 900 के करीब पैरा मेडिकल स्टाफ और सैकड़ों की संख्या में अन्य कर्मी अपना योगदान दे रहे थे ।प्रतिदिन यहाँ पांच हज़ार लोगों ने नेत्र लाभ लिया और कुलमिला कर डेढ़ लाख नेत्र रोगियों ने यहाँ अपना इलाज कराया था । इसकी भव्यता और उच्चतम तकनीक से मरीजों के निर्विकार भाव से इलाज ने लाखों आँखों की रौशनी लौटा दी ।यही नहीं जिनका यहाँ इलाज हो रहा था उन्हें भविष्य में भी अगर कोई समस्या आती है तो उसके लिए उन्हें सम्बंधित रहवास क्षेत्र के मान्य चिकित्सा केन्द्रों में नेत्र कुम्भ के रजिस्ट्रेशन से इलाज कराने की व्यवस्था भी की गयी थी । कुछ दिन पहले जब मै पूर्वी भारत के एक अल्प प्रवास पर था तो मैंने देखा कि जिस गाड़ी से मै यात्रा कर रहा था उसके ड्राइवर ने नेत्र कुम्भ का चश्मा पहना था । मैंने जब पूछा कि ये चश्मा आपको कहाँ से मिला तो उसने बताया कि यह उसे प्रयागराज के नेत्र कुम्भ से प्राप्त हुआ था और तब से वो इसे अपनी आँखों में लगा रहे हैं ।

खैर, मैं आपको 2019 के नेत्र कुम्भ का एक अनुभव बताना चाहता हूँ ।उस दिन संघ के कुछ वरिष्ठ प्रचारक जिसमें मुझे कृष्णगोपाल जी का स्मरण है और जूना अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर अवधेशानंद गिरी भी उपस्थित थे । उस कार्यक्रम में एक दिव्यता फैली हुई थी।कार्यक्रम के समापन के बाद मेरे मन में एक प्रश्न आया कि अभी प्रदेश में विधानसभा चुनाव है और नेत्र कुम्भ का आयोजन तो संघ के ही प्रयास से संभव हुआ है जबकि यहाँ तो गेट पर खड़े होकर दरबान की भूमिका निभाने वाले से लेकर डाक्टर्स तक सभी संघी ही हैं ।कार्यक्रम के बाद किसी को चवन्नी भी नहीं मिलनी है यहाँ तक कि जो भी यहाँ आये हैं अपना पैसा लगा कर वापस अपने घर भी जायेंगे l तो जब इतना बड़ा आयोजन है और चुनाव भी सर पर है तो आरएसएस या भाजपा इसका पोलिटिकल फायदा क्यूँ नहीं ले रहा है ? 

मेरे मन में यह विचार आया कि आरएसएस के खिलाफ लोग इतना भला-बुरा लिखते हैं ।यहाँ तक कि बामपंथी अपना भेष बदल कर निश्च्छल प्रचारकों और वरिष्ठ प्रचारकों को डेटा सेट की तरह इस्तेमाल करके उनके पीठ पीछे साजिश करते हैं l काश अगर ऐसा होता कि जो स्वयंसेवक यहाँ साधारण भेष-भूषा में अपनी सेवाएं दे रहे हैं अगर वो भी संघ की गणवेश में लोगों की सेवा करते । अगर दर्जनों मेडिकल चेम्बर्स में पूजनीय हेडगेवार जी और आदरणीय गोलवलकर जी का फोटो लगा होता । अगर लाखों रोगियों और उनके परिवार को संघ के साहित्य का वितरण होता या फिर कहा जाता कि देखो यह आरएसएस का एक उपक्रम है और तुम वंचित-शोषित-दलित हो इसलिए आरएसएस तुम्हारी सेवा कर रहा है इसलिए आगामी चुनाव में तुम भाजपा को वोट करो ।

मेरे मन में आरएसएस की सरलता या फिर बामपंथी लहजे में मुर्खता पर हँसी आ रही थी कि आरएसएस इतने बड़े आयोजन को बिना प्रोपगंडा के कर रहा है । आखिर इसका फायदा क्या ? आरएसएस इसे भुना क्यूँ नहीं रही है ? क्यूँ नहीं आरएसएस एक बामपंथी प्रोपगंडा मशीनरी की तरह कार्य कर रही है जहाँ एक छोटे-छोटे से छोटे कार्यक्रम पर सैकड़ों पोस्ट लिखे जाते हैं, दर्जनों लेख लिखे जाते हैं और फिर वहां मार्क्स-लेनिन-माओ का चित्र लगा कर प्रोपगेंडा लिटरेचर बांटा जाता है और कहा जाता है कि “भारत तेरे टुकड़े होंगे “ काश आरएसएस भी यहाँ हिन्दू राष्ट्र की वकालत करता काश यहाँ योगी आदित्यनाथ, केशव मोर्य, मोदी और शाह के साथ गुरु गोलवलकर का बड़ा बड़ा आउटलेट पोस्टर इत्यादि लगा होता ।

ये सब विचार मेरे मन में चल ही रहा था कि वहाँ साधारण लोगों से घिरा एक व्यक्ति मुझे दिखा मैंने बोला अपने मित्र से पूछा कि ये कौन हैं ? उन्होंने कहा कि कृष्णगोपाल जी हैं ।संघ से सामान्य परिचय होने के कारण कृष्णगोपाल जी का नाम तो सुना था लेकिन कभी रू-ब-रू देखा नहीं था ।जब मेरे मित्र मुझे उनके पास ले गये और परिचय कराया तो कंधे पर हाथ धर के कहा कसरत करो । मैंने कहा जी करूँगा , लेकिन मेरे मन में जो प्रश्न उठ रहे थे मैंने सोचा कि अपने प्रश्नबम इन्हीं के सामने फोड़ दूँ और बस वही किया मेरे प्रश्न सुनकर वो जोर से हंस दिए और कहा “हम समाज की सेवा इसलिए नहीं कर रहे कि कोई इसका पुरस्कार मिले” इस देश में दधिची हुए इस देश में गांधी-सुभाष, भगत-आजाद हुए” क्या उन्होंने मुझे इस काम का पुरस्कार मिले इसलिए कार्य किया ? हमें अपने महापुरुषों से प्रेरणा लेना चाहिए । संघ कोयल नहीं जो कौवे के घोंसले में अपना अंडा देता हो” मै कृष्णगोपाल जी के प्रतिक्रिया को सुनकर अनुत्तरित हो गया l 

आप सोच रहे होंगे कि मैं इस प्रसंग को आपके सामने क्यूँ रख रहा हूँ ? देखिये मैं इस प्रसंग को आपके सामने इसलिए रख रहा हूँ क्यूंकि हाल ही जी बी पन्त सामाजिक विज्ञान संस्थान के डायरेक्टर ने एक विवादास्पद किताब लिखी है । उसमें उन्होंने कहा है कि आरएसएस वंचितों, शोषितों के प्रति सेवा भाव इसलिए रखता है क्यूंकि वो इसकी तबदीली भाजपा को जिताने के लिए चुनाव में कर सके मतलब आरएसएस का सेवा कार्य एक गेमप्लान है ।मै पूछना चाहता हूँ कि यहीं प्रयागराज के ही आसपास सेवा के नाम से हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन हो रहा है उसपर ऐसे बुद्धिजीवियों की नज़र क्यूँ नहीं गयी ? 

मैं व्यक्तिगत रूप से जितना आरएसएस का क्रिटिक हूँ उतना ही बामपंथियों का भी क्रिटिक हूँ ।मै बताना चाहता हूँ कि मैंने एक बार कुछ संघियों से यह कहा था कि प्रोफ़ेसर साहेब आरएसएस को एक डेटा सेट की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं और इसका इस्तेमाल वो गलत विमर्शों में करेंगे क्यूंकि यह पक्का है । जिस व्यक्ति ने आरएसएस के खिलाफ बोल बोल कर अपना अकादमिक कद गढ़ा है वह कैसे संघ को सकारात्मक रूप से देख सकता है ।मैं सोचता हूँ कि निश्चल प्रचारकों को डेटा सेट की तरह इस्तेमाल करके संघ की नकारात्मक छवि गढ़ने वालों को आरएसएस भले ही माफ़ कर दे।मैं भले ही १००-१५० लेख लिख चुप जाऊं लेकिन जिन लोगों ने आरएसएस के माध्यम के इस राष्ट्र की सेवा बिना जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा, बोली और संस्कार देख कर की है या कर रहे हैं उनकी आत्मा आपको कभी माफ़ नहीं करेगी l 

आदित्यनाथ तिवारी

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