विरोध और बहस से आपसी संबंधों पर असर

युवा नेता, सामाजिक कार्यकर्ता या ग्रामसेवकों को विरोध एवं बहस शब्द का महत्व समझना बेहद आवश्यक है, क्यों आइये समझने का प्रयास करते है।

बहस और विरोध लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और एक समाज के उन्नयन हेतु जरूरी भी।

लेकिन ये बहस और विरोध स्वच्छ एवं युक्तियुक्त होने चाहिए, इससे काफी निहतार्थ निकलते है। यहाँ स्वच्छ और युक्तियुक्तता से आशय यह है कि बहस तर्क, तथ्य एवं विमर्श पर आधारित हो न कि किसी पूर्वाग्रह एवं महत्वकांक्षा पर। जैसे- मानो चर्चा और बात रामायण की हो रही हो और आप उसमें महाभारत की अनावश्यक बातें ला रहे हो।

और इन बहस से वाद-विवाद, तर्क की गुणवत्ता, वक्ता की वाक्पटुता, वक्ता के करिश्मा, हास्य- विनोद कौशल, तत्काल शाब्दिक प्रतिक्रिया की क्षमता और आपसी एकजुटता का विकास होता है।

कुछ वर्षों पूर्व तक हमारे देश मे विमर्श की एक कुशल परम्परा थी। मुक्त चर्चाएं होती थी, बात होती थी, किसी राजनैतिक मुद्दे, हसी-मजाक, खेल- कूद या किसी अन्य विषयक पर व्यापक वाद-विवाद होते थे परंतु यह बहस/विरोध व्यक्तिगत जीवन या संबंधो तक नही जाता था।

लेकिन ये परंपरा आज समाप्त हो गयी है, जिससे हमारे समाज मे काफी दुराव पैदा हो गयी और अच्छे विचार के व्यक्ति इस परंपरा से दूर हो गए हैं। जिससे समाज मे स्वस्थ विचारो का प्रवाह बंद हो गया है ।

कहा जाता है शहरों के अपेक्षा गांव के लोग अब भी बड़े प्रेम से रहते है और समाज के प्रति जागरूक भी हैं। हर छोटे- बड़े मुद्दे को आपसी राय मशविरा करके सुलझा लेते है। लेकिन इस नव पश्चिमी सभ्यता परिवर्तन के बेला में गांव के युवा भी शहर के भांति मानसिकता से बड़े हो रहे है।

मित्रों एक छोटा सा उदाहरण बताता हूँ कैसे इन दिनों बहस या विरोध से आपसी संबंधों में कड़वाहट आ रही है, बीते रात गांव के एक व्हाट्सएप समूह में एक वर्तमान दिनों का चर्चित विषय आया – अगर 70 सालों मे हज सब्सिडी के जगह, हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर पर पूर्ववर्ती सरकारों ने कार्य किया होता तो आज भारत की वर्तमान स्थिति ऐसी भयावह नही होती। फिर एक सज्जन ने उसका कुतर्क करते हुए लिखा वर्तमान सरकार के कार्य काल मे क्या हुआ इसका भी हिसाब- किताब होना चाहिए, पूर्ववर्ती के 70 साल को भूल जाये।

चूंकि मुझे वर्तमान नव सृजित मानसिक विचारों की अच्छी जानकारी है, इसलिए मैं प्रायः ऐसे संवादों मे उलझता नही लेकिन इस रात मुझे भी थोड़ी तिलमिलाहट हुई, और मैंने इसी से जुड़े एक छोटे आंकड़े को प्रस्तुत किया। जिससे सामने वाले सज्जन को शायद पीड़ा हो गयी, उस आंकड़े को स्वयं के सम्मान से जोड़ा और बुरा मान गए। मौके की परिस्थितियों व उम्र की तकाजा को भांपते हुए मैंने स्वयं को इससे दूर किया।

लेकिन उसी समय मे ऐसे दो गुट बन गए एक समर्थन के दूसरे विरोध के, फिर क्या बिना सर पैर का ‘कोल्ड वार’ और बहस समाप्त होते होते कुछ संवेदनशील व्यक्ति समूह से किनारे व कुछ छिटपुट समर्थक भी बाहर।

निष्कर्ष – निर्रथक बहस, एकजुटता में कमी और आपसी संबंधों पर असर

तो समझा आपने, कैसे इन निरर्थक बहसों से आपसी सौहार्द का हनन हो रहा। ऐसे ही देश मे प्रतिदिन अनगिनत बहस/विरोध से हमारे समाज की देश की आपसी संबंध बिगड़ता जा रहा है।

जरूरत है तो पुनः एकजुटता वाले बहस की।

इसलिए मेरा नव सामाजिक युवाओं से आग्रह है, की इन बहसों/विरोधों को अत्यंत गंभीरता से ले, अगर उससे जुड़े तथ्य हो, विचार हो तो प्रस्तुत करें – चुप भी न बैठे। लेकिन कृपया ऐसे निरर्थक विवादों में न फँसे, स्वस्थ बहस और विरोध करे, जिससे हमारे समाज का उन्नयन हो और नए विचारों का सृजन हो।

धन्यवाद!

श्रेयश, वाराणसी
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One comment

  1. यह खुद पूर्वाग्रह से ग्रस्त किसी व्यक्ति की रचना है

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