गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर और काशी

कवि, उपन्‍यासकार, नाटककार, चित्रकार, और महान दार्शनिक गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर एशिया के ऐसे प्रथम व्‍यक्ति थे, जिन्‍हें नोबल पुरस्‍कार से सम्‍मानित किया गया था।

आज उनकी जन्मजयंती पर उन्हें सादर नमन।

बचपन से जिस राष्ट्रगान से राष्ट्रवाद की भावना हमारे अंदर पनपती है ऐसे लेखक के बारे में जानने की बड़ी जिज्ञासा रहती थी।

फिर एक रात घर के बड़े-बुजर्गो की मंडली में बैठने का सौभाग्य मिला तो गुरुदेव के काशी संबंध के काफी किस्से सुनने को मिले। आज जब उनके जयंती के अवसर पर सोशल मीडिया से लेकर न्यूज़ चैनल्स व अधिकतम प्रमुख अखबारो तक ,हर जगह गुरुदेव को पाया तो काशी से जुड़े उनके पुराने किस्से पुनः स्पर्श हुए।

यूं तो गुरुदेव ने पूरे हिंदुस्तान पर अमिट छाप छोड़ी है लेकिन हमारी काशी से भी उनका विशेष नाता रहा है।

तीनों लोको से न्यारी हमारी काशी ने प्राचीन से अर्वाचीन काल तक न केवल देश दुनिया की विद्वता का प्रमाण दिया अपितु मेधाओ को सर्वदा नमन भी किया है । विश्वकवि गुरुदेव ठाकुर का पुण्य श्लोकी नाम भी ऐसे उद्भटो की श्रेणी मे है।

उनको सम्मान देते हुए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने उन्हे डी लिट् की उपाधि से अलंकृत किया। इस उपाधि से नवाजे जाने के पश्चात वे प्रयागराज जाकर बस गए, तब पुनः उन्हे महामना मदन मोहन मालवीय जी ने पत्र लिखकर काशी आने का आग्रह किया। कुछ अभिलेखों व जनश्रुतियों से पता चलता है सन 1925 से 1935 के वर्षों के दौरान गुरुदेव का कई मर्तवा काशी आना-जाना हुआ, इसमे कई बार तो आगमन हेतु महामना का व्यक्तिगत आग्रह भी शामिल रहा। इस दौरान गुरुदेव ने ही काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के फार्मेसी पाठ्यक्रम का भी शुरुआत किया, जोकि आजकल आई. आई. टी. (IIT) परिसर मे संचालित है।

एक तत्कालीन समाचार पत्र से प्राप्त संदर्भों के हवाले से बंगीय समाज काशी के कार्यकारी अध्यक्ष अशोक कांति चक्रवर्ती जी के अनुसार गुरुदेव के परिवार की काफी संपत्तियाँ काशी मे स्टेट के रूप मे रही है। अर्दली बाजार व भोजुबीर का टैगोर स्टेट कभी काफी समृद्ध हुआ करता था। यहाँ उपस्थित टैगोर विला का सौदा तो अभी हाल-फिलहाल मे ही हुआ है। अपने 1925 के काशी यात्रा के दौरान गुरुदेव ने काशी मे निवास कर रहे बंग समाज के साहित्य, संस्कृति और संवर्धन के लिए भी उन्होंने काफी जोर दिया व इसी क्रम मे काशी मे प्रवासी बंगीय साहित्य सम्मेलन की भी स्थापना की।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के एक पूर्व छात्र के अनुसार गुरुदेव ने हिन्दू विश्वविद्यालय पर एक निबंध भी लिखा जिसका वाचन उन्होंने 1911 में कोलकाता के एक कॉलेज में किया और तत्पश्चात विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह को सम्बोधित भी किया।

पत्रिका मैगज़ीन की माने तो गुरुदेव ने अपने ग़ाज़ीपुर से वाराणसी नौका यात्रा के दौरान दो ऐसे उपन्यास की पटकथा दिमाग मे बना ली जिस पर कालांतर में दो फिल्में भी बनी। इनमें एक चोखेर बाली और दूसरी नौका डूबी, एक फिल्म में विश्व सुंदरी ऐश्वर्य राय ने तो दूसरी में राइमा सेन ने नायिका की भूमिका अदा की। इन दोनों सिनेमाओ में काशी वाराणसी के घाटों का अद्भुत चित्रण है।

BHU स्थित भारत कला भवन के स्थापना काल से ही गुरुदेव का इससे विशेष जुड़ाव था, इस भवन के संवर्धन के लिए बनी परामर्शदात्री समिति के वे प्रथम अध्यक्ष भी रहे। कला भवन मे गुरुदेव व उनके परिवार द्वारा रचित चित्रण आज भी इसकी शोभा बढ़ा रहे है।

जहाँ उस दशक में गुरुदेव और काशी का गहरा नाता रहा था तो आज उनके जयंती के अवसर पर छिटपुट कार्यक्रमो का आयोजन होना, कोई भव्य कार्यक्रम आयोजित न होना काफी कष्टकारी है।

ऐसे न जाने कितने किस्से होंगे गुरुदेव के जिससे हम सभी अनिभिज्ञ है। जरूरत है तो ऐसे किस्सों को आज के युवा पीढ़ी तक पहुचाने की ताकि गुरुदेव व काशी का प्रगाढ़ संबंध कमजोर न होने पाए।

गुरुदेव भारतीय संस्कृति के अतीत एंव गौरव के सरंक्षक थे ,उनका जीवन साहित्य शिक्षा एंव दार्शनिक के रूप में देशवासियों हेतु प्रेरक है। जब देश स्वतंत्रता के 75 वर्ष के उपलक्ष्य में इस अमृत महोत्सव यानी स्वाधीनता सेनानियों से प्रेरणाओं का अमृत प्राप्त करने का उत्सव मना रहा मेरा साहित्य जगत एवं उपन्यासकारों से विशेष आग्रह है कि वे इस महोत्सव में अपना योगदान दे और गुरुदेव एवं काशी से संबंधित ऐसे अनसुने किस्से व कहानियों को समेट कर समाज तक पहुचाएं।

श्रेयश, वाराणसी ✍️✍️

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