वैक्सीन मैत्री अभियान और भारत

कोरोना ने वैश्विक महामारी के तौर पर जो हानि पहुंचाने का कार्य किया है वो एक बुरी यादों के तौर पर देखा जाएगा। कोरोना की प्रथम लहर में भारत ने सख्त लॉकडाउन की वजह से इसके खिलाफ़ लड़ने में बड़ी अग्रज भूमिका निभाई। जबकि विश्व को अंदेशा था कि भारत इससे निजात जल्दी नही पा पाएगा व बड़ी संख्या में जनहानि होगी।

परन्तु इसके विपरीत हुआ और भारत ने सफलता पूर्वक इससे लड़ाई लड़ी। भारत ने सर्वप्रथम कोरोना के खिलाफ़ वैक्सीन का निर्माण भी किया वो भी दो कम्पनियों ने।

देश मे टीकाकरण का कार्य प्रारंभ हो चुका था, फ्रंटलाइन वर्कर पहले थे टीका लगवाने वालो में। इस के बाद वृद्धजनों को टिका लगाने की शुरुआत की गई। इसी बीच भारत सरकार ने वैक्सीन मैत्री नामक अभियान से टीको का वितरण अन्य देशों को करना शुरू कर दिया। ब्राजील ने तो इसकी वैश्विक मंच पर भारत की सराहना भी की। भारत ने अनेकों देशों को टिका उपलब्ध करवाया।

इसी बीच दुसरीं लहर व युवाओं के टिका लगाने की बारी आई। दुसरी लहर व्यापक हो चुकी थी व टिके की उपलब्धता में कमी आने लगी। इसी कारण केंद्र सरकार विपक्ष के निशाने पर आ गई। भारत सरकार को इस दुसरी लहर का जिम्मेदार माना गया। अस्पतालो में ऑक्सीजन सिलेंडर, वेंटिलेटर, रेमेडिसिवर इंजेक्शन की कमी पड़ने लगी।

अब मदद की बारी उन देशों की थी जिनकी मदद भारत ने ‘वैक्सीन मैत्री’ नामक अभियान से की थी। अनेकों देशों ने भारत को ऑक्सीजन सिलेंडर, रेमेडिसिवर इंजेक्शन, वेंटिलेटर मदद के तौर पर दिए। इसी बीच केन्या नामक देश ने भारत को कुछ टन अनाज मदद के तौर पर दिए इसकी आलोचना (देश के अंदर) भी हुई।

मगर भारत मे किसी भी सहयोग को छोटा या बड़ा नही समझा जाता। रामसेतु के निर्माण में गिलहरी की भूमिका हो या सुदामा द्वारा कृष्ण को मुट्ठी भर चावल देना, हमेशा विनम्रता से इनका स्वागत किया है और वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा को सार्थकता प्रदान की है।

भारत इन देशों का सदैव आभारी रहेगा।

सूरज सैन
सामाजिक कार्यकर्ता,
जयपुर, राजस्थान

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *